अक्तूबर 10, 2015

रवींद्र जैन को विनम्र श्रद्धांजलि !!!!!

हिंदी सिनेमा में 70 से 80 के दशक में  एक से बढ़ कर एक सुरीली और कर्णप्रिय संगीत रचनाओं को  देने वाले गीतकार-संगीतकार रवींद्र जैन का निधन संगीत संसार के लिए बहुत बड़ी क्षति है। वे पिछले कुछ दिनों से बीमार थे और लीलावती अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। 71 वर्षीय रवीन्द्र जैन यूरिनरी इंफेक्शन के चलते किडनी की बीमारी से पीडित थे।


सच तो यह है  कि  रवींद्र जैन एक ऐसी शख्सियत हैं जो संगीतकार होने के साथ-साथ बेहतरीन  गीतकार और गायक भी थे।गीतकार और गायक भी थे। उनके द्वारा संगीतबद्ध रचनाएं भारतीय संगीत जगत की यादगार रचनाएं हैं। हिंदी सिनेमा जगत को उन्होंने  'अखियों के झरोखों से', 'गीत गाता चल', 'कौन दिशा में लेके', 'सजना है मुझे सजना के लिए', 'घुंघरू की तरह', 'हुस्न पहाड़ों का', 'अनार दाना', 'देर न हो जाए', 'जब दीप जले आना' 'मैं हूं खुशरंग हिना', 'जब दीप जले आना', 'ले जाएँगे, ले जाएँगे, 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे', ' ले तो आए हो हमें सपनों के गाँव में', ' एक राधा एक मीरा', 'अँखियों के झरोखों से', 'सजना है मुझे सजना के लिए', 'हर हसीं चीज का मैं तलबगार हूँ', 'श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम' ,'वृष्टि पड़े टापुर टूपुर',' आज से पहले, आज से ज्यादा गूँचे लगे हैं कहने, फूलों से भी सुना हैं तराना प्यार का तू जो मेरे सूर में, सूर मिला ले, संग गा ले 'सुन साहिबा सुन' जैसे प्यारे नग्मे दिए , जो अपने दौर में तो लोकप्रिय हुए ही आज भी संगीत प्रेमी उन्हें उसी चाव से सुनते हैं ।  उन्हें इसी  साल देश के चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्मश्री के लिए चुना गया था । mUgs dSfj;j  की शुरुआत में ही 1976 में आई फिल्म 'चितचोर' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार और उसके बाद 1978 में फिल्म 'अखियों के झरोखों से' के लिए भी सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उल्लेखनीय बात यह थी कि फिल्म के शीर्षक गीत 'अखियों के झरोखों से' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 1985 में फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' में संगीत देने के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक और 1991 में फिल्म 'हिना' के गीत 'मैं हूं खुशरंग हिना' के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

28 फरवरी, 1944 को अलीगढ़ में संस्कृत के प्रकांड पंडित और आयुर्वेद विज्ञानी इंद्रमणि जैन की संतान के रूप में जन्मे रवीन्द्र सात भाई-बहिन थे। कम उम्र में ही वे पास के जैन मंदिर में भजन गाने लग गए थे। जन्म से उनकी आँखें बंद थीं जिसे पिता के मित्र डॉ. मोहनलाल ने सर्जरी से खोला। साथ ही यह भी कहा कि बालक की आँखों में रोशनी है, जो धीरे-धीरे बढ़ सकती है, लेकिन इसे कोई काम ऐसा मत करने देना जिससे आँखों पर जोर पड़े।  पिता ने डॉक्टर की नसीहत को ध्यान में रखकर संगीत की राह चुनी जिसमें आँखों का कम उपयोग होता है। बचपन से ही जिज्ञासु  रवीन्द्र ने अपने बड़े भाई से उपन्यास, कविताओं के भावार्थ समझे। धार्मिक-ग्रंथों तथा इतिहास-पुरुषों की जीवनियों को सुनकर प्रेरणा ली । बाद में उन्होंने रविन्द्र संगीत भी सीखा।

जैन ने अपने फिल्मी dSfj;j  की शुरुआत फिल्म सौदागरसे की थी। उनका पहला फिल्मी गीत 14 जनवरी 1972 को मोहम्मद रफी की आवाज में रिकॉर्ड हुआ। उन्होंने 1970 के दशक में चोर मचाए शोर, गीत गाता चल, चितचोर और अंखियों के झरोखे जैसी सुपरहिट फिल्मों को अपनी सुरीली धुनों से सजाया था। उन्होंने 70 के दशक में बॉलीवुड संगीतकार के रूप में अपना करियर शुरू किया और 'चोर मचाए शोर' (1974), 'गीत गाता चल' (1975), 'चितचोर' (1976), 'अखियों के झरोखों से' (1978) जैसी हिंदी फिल्मों में संगीत दिया। रवींद्र जैन ने कई फिल्मों और टीवी सीरियल्स में संगीत दिया था। इसमें अखियों के झरोखे’, ‘चितचोर’, ‘गीत गाता चल’, ‘विवाहके अलावा सीरियल रामायण’, ‘श्रीकृष्णामें म्यूजिक और आवाज दी। 1980 और 1990 के दशक में जैन ने कई पौराणिक फिल्मों और धारावाहिकों में संगीत दिया था। 1985 में फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' में संगीत देना उनके लिए उपलब्धि रही । इस फिल्म के लिए उन्हें  फिल्मफेयर अवार्ड मिला । इसके बाद दो जासूसऔर हिनाके लिए भी उन्होंने म्यूजिक डायरेक्टर रवींद्र जैन ने बॉलीवुड में यादगार संगीत दिया। रामानंद सागर के  टेलीविजन धारावाहिक   'रामायण' में इन्हीं ने संगीत दिया.


2015 में रवींद्र जैन को पद्मश्री अवॉर्ड से भी नवाजा गया.दक्षिणी भारत के गायक येसुदास के वे काफी मुरीद थे और एक बार उन्होंने कहा था कि अगर मैं देख पाऊं तो सबसे पहले येसुदास का चेहरा ही देखूंगा। गायिका हेमलता के साथ उन्होंने  बांग्ला तथा अन्य भाषाओं में धुनों की रचना की ।  हेमलता से नजदीकियों के चलते उन्हें ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग कम्पनी से ऑफर मिलने लगे। राजश्री प्रोडक्शन के ताराचंद बड़जात्या से मुलाकात रवीन्द्र के फिल्म करियर को सँवार गई। राजश्री प्रोडक्शन्स की फिल्म  'सौदागर' में गानों की गुंजाइश नहीं थी। उसके बावजूद रवीन्द्र ने गुड़ बेचने वाले सौदागर के लिए मीठी धुनें बनाईं, जो यादगार हो गईं। यहीं से रवीन्द्र और राजश्री का सरगम का कारवाँ आगे बढ़ता गया। 'तपस्या', 'चितचोर', 'सलाखें', 'फकीरा' के गाने लोकप्रिय हुए और मुंबइया संगीतकारों में रवीन्द्र का नाम स्थापित हो गया। 'दीवानगी' के समय सचिनदेव बर्मन बीमार हो गए तो यह फिल्म उन्होंने रवीन्द्र को सौंप दी। एक महफिल में रवीन्द्र-हेमलता गा रहे थे। श्रोताओं में राज कपूर भी थे। 'एक राधा एक मीरा दोनों ने श्याम को चाहा' गीत सुनकर राज कपूर झूम उठे, बोले- 'यह गीत किसी को दिया तो नहीं?' पलटकर रवीन्द्र जैन ने कहा, 'राज कपूर को दे दिया है।' बस, यहीं से उनकी एंट्री राज कपूर के शिविर में हो गई। आगे चलकर 'राम तेरी गंगा मैली' का संगीत रवीन्द्र ने ही दिया और फिल्म तथा संगीत बेहद लोकप्रिय हुए। 71 वर्षीय रवीन्द्र जैन का निधन हिन्दी सिनेमा संगीत के लिए एक ऐसी क्षति है जिसे पूरा किया जाना निश्चय रूप से नामुमकिन होगा।   

अगस्त 18, 2015

गुलज़ार साहब सालगिरह मुबारक़ हो !

ये राह बहुत आसान नहीं,
जिस राह पे हाथ छुड़ा कर तुम
यूँ तन तन्हा चल निकले हो
इस खौफ़ से शायद राह भटक जाओ ना कहीं
हर मोड़ पर मैंने नज़्म खड़ी कर रखी है!

थक जाओ अगर--
और तुमको ज़रूरत पड़ जाए,
इक नज़्म की ऊँगली थाम के वापस आ जाना!

ज़्म के बहाने अपने चाहने वालों को आवाज़ देते ये  गुलज़ार साहब हैं  जो आज 80 वें बरस में आमद फरमा रहे हैं। गुलज़ार साहब अपने वक्त की एक ऐसी महत्वपूर्ण इबारत हैं जिसे पढ़ना बेहद जरूरी है। सफेद कुर्ते में झांकता गुलज़ार साहब (मूल नाम-संपूर्ण सिहं कालरा) का शफ्फ़ाक बदन, चश्मे के पीछे से बोलती हुई आँखें और उर्दू/फ़ारसी  की चाशनी में ढली हुई उनकी ज़ुबान उनके व्यक्तिव का वह हिस्सा है जिसे कोई भी अनदेखा नहीं कर सकता। जहां एक ओर वे  निर्देशक, निर्माता, संवाद लेखक, पटकथा लेखक, गीतकार के रूप में हिन्दी फिल्मों के लिए सरमाया हैं वहीं  अदबी दुनिया में वे एक बेहतरीन किस्सागो, कवि, गीतकार, ग़ज़लकार, नाटककार के रूप में जाने जाते हैं। एक ऐसा जहीन आदमी उनके किरदार से झांकता है जिसको देखना, सुनना, पढ़ना, मिलना सब कुछ रूहानी सा लगता है। ग़ालिब, मीर, अमीर ख़ुसरो, रूमी, बाबा बुल्ले शाह, मीरा, कबीर के माध्यम से गुलज़ार की रचनाओं में जहां सूफी कलाम की खुश्बू आती है वहीं नए जमाने के लफ्ज़ों को इस्तेमाल कर वे नयी पीढ़ी के बीच भी अपनी लोकप्रियता बनाये हुए हैं। उनकी कामयाबी का एक पहलू यह भी है कि वे टी.वी. गीतों/सीरियलों के माध्यम से इतनी मकबूलियत पाते हैं कि जो किसी के लिए स्वप्न सरीखा ही हो सकता है। ‘हमको मन की शक्ति देना ‘ से लेकर ‘चड्ढी पहन के फूल खिला है‘ जैसे गीत उनकी क्रियेटिविटी का नायाब नमूना हैं।

18 अगस्त 1936 को पैदा हुए गुलजार आज के पाकिस्तान और बीते दौर के हिन्दुस्तान में पंजाब सूबे के झेलम जिले के छोटे से  कस्बा दीना में। बंटवारे के बाद गुलजार का परिवार अमृतसर और फिर  दिल्ली आ गया।  गुर्बत से जूझते परिवार को सहारा देने के लिए और अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए गुलजार ने बचपन में ही एक पेट्रोल पम्प पर नौकरी की। मगर इस दौरान उनके अन्दर शायर उन्हें परेशान करता रहता था। वे नौकरी करते थे और साथ ही शायरी भी करते हुए उसे सफ्हों पर उतारते रहते। कुछ समय बाद वे बम्बई आ गए और ‘प्रोग्रसिव राईटर ऐसोसिएशन’ से जुड गए, जिसके जरिए उन्हें गीतकार शैलेन्द्र से मिलने का अवसर मिला।  शैलेन्द्र ने उनमें गीतकार की संभावना को तलाश लिया और संगीतकार एस.डी.बर्मन से मिलवाया बल्कि ‘बंदिनी’ फिल्म में गीत लिखवाने के लिए भी  उनसे आग्रह किया । एस.डी.बर्मन ने भी उन पर भरोसा किया और सामने आया लता जी की आवाज में ‘मोरा गोरा रंग लई ले/मोहे श्याम रंग दई दे, छुप जाउंगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे’(1963 बन्दिनी)। इस तरह उन्हें पहले बिमल राय फिर उनके बाद ऋषिकेश मुखर्जी, हेमंत कुमार का जबरदस्त साथ मिला। बिमल राय के सानिध्य में उन्हें बन्दिनी से जो शुरूआती सफलता मिली उसे उन्होने ऋषिकेश मुखर्जी से मिलकर ‘आनंद’ (1970), ‘गुड्डी’ (1971), ‘बावर्ची’(1972) और ‘नमक हराम’(1973) के साथ-साथ असित सेन की ‘दो दूनी चार’ (1968), ‘खामोशी’(1969) और ‘सफर’(1970) जैसी फिल्मों के माध्यम से एक स्थायी पहचान के रूप में तब्दील कर लिया। 1971 में उन्होने स्वतंत्र निर्देशक के रूप में एक फिल्म बनाई ‘मेरे अपने’। 1972 में उन्होने मूक-बधिरों के भावों को उकेरते हुए एक कालजयी फिल्म बनाई ‘कोशिश’। इस फिल्म में नायक-नायिका थे संजीव कुमार और जया भादुड़ी। ‘कोशिश’ के बाद तो गलजार- संजीव कुमार की ऐसी जोड़ी जमी कि इसकी लज्ज़त आंधी (1975), मौसम (1976), अंगूर (1981) और नमकीन (1982) तक मिलती रही। जोड़ी की बात करें तो पंचम यानी आर0डी0 बर्मन और गुलजार की जोड़ी का जिक्र करना लाजिमी है। एक गीतकार और संगीतकार के रूप में इस जोड़ी ने कमाल की पेशकश दी। इन दोनों ने मिलकर 21 फिल्मों के अलावा कुछ एलबम भी किये।

गुलजार ने अलग-अलग वक्त में अलग-अलग तरीके से अपनी जोड़ी बनाई। बतौर जोड़ी उन्हें सलिल चैधरी, ए.आर. रहमान, जगजीत सिंह और फिलवक्त विशाल भारद्वाज से भी जोड़ा जा सकता है। अगर मैं इस दरम्यिाँ मीना कुमारी और गुलजार का जिक्र न करूँ तो शायद बात अधूरी रह जायेगी। ‘बेनजीर’ के सहायक निर्देशक के रूप में गुलजार को मीना कुमारी के नजदीक जाने का मौका मिला। इन दोनों के बीच में जबरदस्त भावुकता पूर्ण रिश्ता रहा। मीना कुमारी अपनी शायरी की वसीयत गुलजार के नाम कर गई। गुलजार ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ‘मीना कुमारी की शायरी’ नाम से यह वसीयत पाठकों तक पहुॅचाने का कार्य किया।

फिल्मों के अलावा अदब में भी गुलज़ार की शिनाख़्त साहित्यकार की है। यूं तो गुलजार ने मुख्यतः हिन्दी, उर्दू, पंजाबी को अपनी अभिव्यक्ति का जरिया बनाया है लेकिन अवसर पडने पर उन्होने ब्रज, अवधी, राजस्थानी, हरियाणवी लोक भाषा में भी रचनायें की हैं। उन्होने चैरस रात (लघु कथाएॅ, 1962), जानम (कविता संग्रह, 1963), एक बूॅद चाॅद(कविताएॅ, 1972), रावी पार (कथा संग्रह, 1997), ‘चाँद रात और मैं’’ (2002), रात पश्मीने की, खराशें (2003) पुखराज, प्लूटो आदि कई पुस्तकें लिखी हैं। त्रिवेणी जैसी विधा के वे जनक हैं। बाल साहित्य और इवेंट थीम साँग में उनकी हैसियत एक लीजेण्ड जैसी है।

विभिन्न फिल्मी पुरूस्कारों से लेकर तमाम सरकारी सम्मान उनके हिस्से में हैं। सच तो यह है कि अब उन्हेें कोई सम्मान मिलना उस सम्मान का ही मान बढ़ाता है। उन्हें ‘जय हो’ के लिए आॅस्कर (2009), पद्म भूषण (2004) साहित्य अकादमी सम्मान (2002) के अलावा 10 फिल्म फेयर अवार्ड, ग्रेमी अवार्ड के अलावा कितने ही राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं । 2013 का दादा साहब फाल्के सम्मान से भी उन्हें नवाजा जा चुका है।


कुछ ऐसी बातें जो तुझसे कही नहीं हैं मगर
कुछ ऐसा लगता है तुझसे कभी कही होंगी

तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं हूँ तेरी क़सम
तेरे ख़यालों में कुछ भूल-भूल जाता हूँ
जाने क्या, ना जाने क्या था जो कहना था
आज मिल के तुझे जाने क्या... !

आज भी गुलजार के गीतों में वही ताजगी और दिलोदिमाग को राहत पहुंचाने वाली तासीर बाकी है जो पचास बरस पहले थी। गुलजार साहब के लिए इस मुबारक मौके पर यही कहा जा सकता है ‘‘ तुम जियो हजार बरस........’’।

जून 18, 2015

नयी सोच और नये लहजे के शायर - गौतम राजरिशी

ज़ल का सफर यूँ तो सात सौ बरस पुराना है लेकिन मज़मून और मफ़हूम के स्तर पर इसमें मुसलसल तब्दीलियां होती रही हैं। जुबान के तौर पर भी ग़ज़ल ने तब्दीलियों का एक तवील सफ़र तय किया है। ख़ालिस फ़ारसी से लेकर अरबीउर्दूहिन्दीक्षेत्रीय भाषाओं तक में ग़ज़ल को ओढ़ा बिछाया गया है। ग़ज़ल में इन्हीं तब्दीलियों का एक दौर 1991 के बाद से देखा जा सकता है। इस दौर के शाइरों की सोच और उनकी अभिव्यक्ति को ग़ौर से देखें-परखें तो पायेंगें कि क़दीमी शेरी रिवायत से ये शायरी बिल्कुल बदली हुई है। तमाम व्याकरण पाबन्दियों को अपनाने के बाद भी इस दौर की ग़ज़लियात में सोच और ज़़बान में ये परिवर्तन साफ झलकता है। इसी दौर और बदलते वैचारिक परिवर्तन की एक बानगी हैपाल ले एक रोग नादाँ.... शेरी मजमूआ।

ये शेरी मजमुआ कर्नल गौतम राजरिशी की ग़ज़लों का है। चालीस साला गौतम राजरिशी एकदम नयी सोच व नये लहजे के शायर हैं। बीते दिनों में तमाम अदबी पत्रिकाओं में उनकी रचनायें प्रकाशित हुई हैं। वर्चुअल वर्ल्ड /सोशल साइट्स पर भी उनकी उपस्थित लगातार बनी रहती है।पाल ले एक रोग नादाँ....’ पढ़ते वक्त शायर के विषय में कुछ ख़यालात पुख्ता होते हैं। गौतम की ग़ज़लें पढ़ते हुये सामान्य तौर पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे न केवल नई सोच के शायर हैं बल्कि ज़ुबान के तौर पर भी उन्होनें हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी की भाषाई त्रिवेणी के साथ देशज शब्दों का भी भरपूर इस्तेमाल किया है। जाहिर है कि शायर की दिलचस्पी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में कहीं ज्यादा हैबनिस्पत भाषा की बाध्यताओं को समझने के। गौतम इस मजमूअे में कई रंग बिखेरते हैं। उनकी शायरी में यह साफ झलकता है कि वे अपने दौर के कई शायरों से भाषाईवैचारिक स्तर पर प्रभावित है। गौतम कई स्थानों पर बशीर बद्रगुलज़ार जैसे लहजे में अपनी बात कहते हुये नज़र आते हैंलेकिन उनका यह तरीका अनायास भी सम्भव है। गौतम की शायरी का एक मजबूत पक्ष नये-नये विम्बों का इस्तेमाल भी है जो पाठकों को प्रभावित करता है। 

ऐसी लफ़्ज़ियात जो ग़ज़ल में आम फहम नहीं मानी जाती है उसका बेरोक टोक प्रयोग गौतम की उस हिम्मत को दिखाता है कि फौज का सिपाही किस हद तक मोरचा ले सकता है। गौतम की ग़ज़लियात का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि वे उस भाषाई ओवर लैपिंग की गिरफ्त में हैं जो आजकल की अवामी जुबान है। वे ये परवाह नहीं करते कि कौन सा लफ़्ज किस ज़बान का हैउन्हें जिद है तो बस यह कि अपने भाव किस प्रकार अभिव्यक्त हो जायें। वे हिन्दी के कठिन शब्दों के साथ पापुलर अंग्रेजी शब्द की चाशनी बनाकर ख़ालिस उर्दू लफ़्जियात का इस्तेमाल कर अपनी शायरी को मुख़्तलिफ़ ज़बानों को त्रिवेणी बना देते हैं। इसी प्रकार वे लोक जीवन के भी तमाम इलाकाई लफ़्ज़ों का भरपूर इस्तेमाल कर अपनी ग़ज़़लों को समृद्ध बनाते हैं। नई लफ्ज़ि़यातजैसे-बटोही (पृ0 53),  बरखरा (पृ0 47), इतउत (पृ0 40), तमक (पृ0 22), चुकमुक (पृ0 26), मसहरी (पृ0 26),  नियम (पृ0 27), आयाम (पृ0 37), सपेरे (पृ0 77) इत्यादि उनकी ग़ज़लों का अभिन्न हिस्सा है जो उनकी वैचारिक अभिव्यक्ति में पाठको तक सीधे रूप से अपने सम्पूर्ण अर्थों के साथ सम्प्रेषित होते हैं। वे इस बहस में भी नहीं पड़ते कि कहाँ उर्दू ग़ज़़ल की सीमा खत्म होती है और कहां से हिन्दी ग़ज़ल शुरू हो जाती है। हिन्दी के काफियों का भरपूर इस्तेमाल उनके इस ग़ज़ल संग्रह में लगातार दिखायी पड़ता है।
बड़के ने जब चुपके-चुपके कुछ ख़ेतों की काटी मेड़
आये-जाये छुटके के संग अब तो रोज कचहरी धूप
बाबूजी हैं असमंजस मेंछाता लें या रहने दें
जीभ दिखाये लुक-छिप लुक-छिप बादल में चितकबरी धूप

भाषाई विविधता का यह पराक्रम गौतम की शायरी में आगे भी निर्बाध रूप से जारी रहता है। अंग्रेजी के शब्दों जैसे- सिगरेटशावरस्टोव,बालकोनीमोबाईलबल्बन्यूज पेपरसोफास्कूटीसिम्फनीसेंसेक्सकारगिटार के अतिरिक्त और भी न जाने कितने अंग्रेजी शब्द गौतम की शायरी में लगातार डूबते इतराते नजर आते हैं। बानगी के तौर पर चन्द शेर मुलाहिज़ा हों-
येल्लो पोल्का डॉट‘ दुपट्टा  तेरा उड़े
तो मौसम भी चितकबरा हो जाता है।
*****
इश़्क का ओएसिस‘ हो या हो यादों का
धीरे-धीरे सब  सहरा हो जाता है
*****
चैक पर बाइक‘ ने जब देखा नज़र भर कर उधर
कार की खिड़की में इक साड़ी‘ संभलती रह गयी।
*****
एक कप कॉफ़ी  का वादा भी न तुमसे निभ सका
कैडबरी रैपर के अंदर ही पिघलती रह गयी।

काफिया पैमाई भी गौतम की ग़ज़लियात का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कलर के साथ हुनरसीलन के साथ रोमन और इंजन का काफिया इस्तेमाल करना गौतम की कामयाबी का प्रतीक है। आशिक-माशूक के ज़ाविये से देखा जाये तो एक उदास नायक तन्हाई में किस तरह अपने इश्क के विषय में सोचता हैयह अन्दाज उनके शेरी कैनवास में कई रंग बिखेरता है। गौतम फौज़ में अफसर हैं और उन्होंने अपनी नौकरी का एक बड़ा वक्त अपने परिवार समाज से दूर रहकर दुर्गम पहाड़ों और ऐसी स्ट्रेटेजिक  लोकेशन्स पर गुजारा है जहां जीवन जीना आसान नहीं। मुश्किल परिस्थितियों से एकाकार होते हुये उनका यह एकाकीपन पाठकों को सहज ही आकर्षित करता है-

फुरसत मिले अगर तेरी यादों से इक ज़रा
तब तो कहूँ कि हाय रे फ़ुरसत नहीं मुझे
*****
लुफ़्त अब देने लगी है ये उदासी भी मुझे
शुक्रिया तेरा कि तूने जो कियाअच्छा किया।
*****
लिखती हैं क्या क़िस्से कलाई की खनकती चूड़ियाँ
जो सरहदों पर जाती हैंउन चिट्ठियों से पूछ लो
*****
सुलगी चाहततपती ख़्वाहिशजलते अरमानों की टीस
एक बदन दरिया में मिलकर सब तूफ़ान उठाते हैं।
*****
पाल ले एक रोग नादाँ.........’ गौतम की उन कजरारी यादों का एक संकलन हैजिन्हें वे तमाम दुर्गम परिस्थितयों के बीच भी ग़ुनगुनाना नहीं भूलते। यही गुनगुनाहट ग़ज़लों का रूप धर लेती है-  
सुलगती हुई उम्र की धूप में
यूँ ही ज़िन्दगी सांवली होती है।
*****
छू लिया उसने ज़रा मुझको तो झिलमिल हुआ मैं
आस्माँ ! तेरे सितारों के मुक़ाबिल हुआ मैं।
*****
काँपती रहती हैं कोहरे में ठिठुरती झुग्गियाँ
धूप महलों में न जाने कब से है अटकी हुई।
*****
होती है गहरी नींद क्याक्या रस है अब के आम में
छुट्ठी में घर आई इरी इन वर्दियों से पूछ लो।

मजमूअे के कवर पेज से ही एक आकर्षण पाठकों को अपनी ओर खींचने लगता है। ज़ाहिर है कि मुख पृष्ठ पर सिगरेट और धुएँ का श्वेत श्याम तस्वीर पाठकों के चिंतन को धधकाने और सुलगने के लिए प्रेरित करती है। इस कलेवर के लिए प्रकाशक और इलस्ट्रेटर टीम को बधाई देनी होगी।  कई मर्तबा महसूस होता है कि सिगरेट के धुंओं के छल्ले में फंसी तमाम फ़िक्रों का नाम ही है पाल ले इक रोग नादाँ.....।’ अनेकानेक शेरों में प्रयोग किये गये कुछ अल्फ़ाज़ गौतम की नितान्त अपनी क्रियेटिविटी का नमूना  हैं-

इक तो तू भी साथ नहीं हैऊपर से ये बारिश उ़फ
घर तो घरसारा-का-सारा द़फतर नीला-नीला है।
*****
उबासी लेते सूरज ने पहाड़ों से जो माँगी चाय
उमड़ते बादलों की केतली फिर खौलती उट्ठी।
*****
धूप शावर में जब तक नहाती रही
चाँद कमरे में सिगरेट पीता रहा।
*****
है चढ़ने लगी फिर से ढलती हुई उम्र
तेरी शर्ट ये जा़फ़रानी कहे है।

बहरहाल गौतम की ग़ज़लों को पढ़ते हुये रगों में कभी सिहरन सी दौड़ जाती है तो कभी दिमागी नसें कुलबुलाहट करने लगती हैं। उनकी ग़ज़लों को पढ़ते वक्त यह अहसास होता है कि बर्फीली वादियों में चीड़ के पेड़ों के साये में सन्नाटे को तोड़ती हर आवाज सरहद पार से आने वाली जानलेवा गोलियों की आशंका से लिपटी हुई होती हैऔर इन्ही आवाजों के दरम्यिान कोई फ़ौजी जीवन के तमाम अहसासात को कुछ इस तरह अपनी जुबान दे रहा होता है- 

रगों में गश्त कुछ दिन से
कोई आठों पहर दे है।
*****
एक सिगरेट-सी दिल में सुलगी कसक
अधजलीअधबुझीअधफुकी हाँ वही।
*****
फोन पर बात तो होती है खूब  यूँ
तिश्नगी फोन से कब बुझी हाँ वही।
*****
चीड़ के जंगल खडे थे देखते लाचार से
गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से।

पाल ले इक रोग नादाँ ज़िन्दगी के वास्ते......’ यूँ तो फिराक ने यह ग़ज़ल कोई  चालीस-पैंतालीस साल पहले लिखी थी लेकिन गौतम ने इस मिसरे को इस कदर अपनी ग़ज़लों में जिया है कि यह मिसरा उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का अभिन्न हिस्सा सा लगने लगा है-

अहमियत सन्नाटे की क्या है बगैर आवाज के
अब करो कुछ शोर यारों खामुशी के वास्ते
थोड़े आँसू भी निकलते हैं हँसी के वास्ते
’ पाल ले इक रोग नादाँ जिन्दगी के वास्ते

शिवना प्रकाशन ने कर्नल गौतम की इस कृति को पाठकों के सामने लाकर न केवल मनन बल्कि गर्व करने का अवसर भी दिया है कि कश्मीर और ऐसे ही अनेकानेक दुर्गम स्थलों पर देश की रक्षा में अपने जीवन को दाँव पर लगाने वाले सैनिकों के साहस में कहीं न कहीं मासूम सी भावनाएं भी होती हैं। इन भावनाओं को वे बेशक अभिव्यक्त न कर पाते हों मगर उन्हें भावशून्य नहीं माना जा सकता। गौतम की ग़ज़लें सिर्फ एक सैन्य अफसर की रचनाऐं नही हैंदरअसल वे भारतीय सेना की उन धड़कनों की आहटें हैं जो बेशक अभिव्यक्त नही हैं लेकिन महसूस करिये तो वे आपकी धड़कनों के साथ हमआहंग हो जाती हैं।
                डा0 राहत इन्दौरी के लफ़्जों में गौतम की ग़ज़लों में शुरू से आखिर तक एक उदासी की फ़जा पसरी हुयी है और इस रूमानी उदासी से ग़ज़ल का आँगन महक रहा है। मुनव्वर राना की यह बात भी यहां उल्लेखनीय है कि कश्मीर के ब़र्फीले पहाड़ से आईं ये ग़ज़लें अपनी नज़ाकत और अपने नये लह़जे से जहाँ एक ओर हैरान करती हैं,  वहीं दूसरी ओर बहुत आश्वस्त भी करती हैं कि ग़ज़़ल हमारे बाद की पीढ़ी के सशक्त हाथों में महफूज़ है।

कुछ करवटों के सिलसिलेइक रतजगा ठिठका हुआ
मैं नींद हूँ उचटी हुईतू ख़्वाब है चटका हुआ।
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जनवरी 18, 2015

' दस्तक '...... नयी नस्ल अदब के दरवाज़े पर !!!




               उर्दू अदब में ग़ज़ल को हमेशा एक दिलचस्प विधा के रूप में देखा जाता रहा है। इस विधा को यूं तो अमीर ख़ुसरो से लेकर मीर ग़ालिब-इकब़ाल-फ़िराक जैसे नामचीन और उसके बाद के अनगिनत शाइरों ने और भी समृद्ध किया है लेकिन अस्सी की दहाई और उसके बाद के पैदाइश वाले शाइरों ने भी अपने पूरे जतन- सामर्थ्य के साथ इस विधा को शादाब करने का काम किया है। इस नयी पौध ने बीते कुछ बरसों में अदब के हलक़ों में अपनी पुख़्ता आमद दर्ज करायी है। इन्हीं शाइरों की शाइरी का एक सकंलन ‘दस्तक’ नाम से प्रकाशन संस्थान ने प्रकाशित किया है। इस मजमूअ: में विकास शर्मा ‘राज’, सग़ीर आलम, सालिम सलीम, ग़ालिब अयाज़, मुईद रशीदी, स्वप्निल तिवारी, पराग अग्रवाल, दिनेश नायडू, सैय्यद तालीफ़ हैदर, ज़िया ज़मीर, इरशाद खान सिकन्दर, मनोज अज़हर, अभिषेक शुक्ला, सिराज फै़सल ख़ान, गौतम राजरिशी, बृजेश अम्बर, ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र, विपुल कुमार, वीनस केसरी, अंकित सफर, आदिल रज़ा मंसूरी, प्रखर मालवीय, अमीर इमाम, जतिन्दर ‘परवाज’ तथा पवन कुमार को शामिल किया गया है। बहैसियत संपादक/संकलनकर्ता मैंने इस मज़्मुए में ग़ज़लकारों के विषय में अपनी राय लिखते हुये शाइरों की प्रतिनिधि शाइरी भी प्रस्तुत की है। इस मज्मुअे के शुरू में मैंने 'ग़ज़ल के सफर' पर भी मुख़्तसर सी रोशनी डालने की कोशिश की है, जिसमें ग़ज़ल के सात सौ बरस के इतिहास तथा ग़ज़ल की खुसूसियत पर कुछ लिखने की कोशिश भर की है।

                   बहरहाल! ‘दस्तक’ उन तमाम शोअरा को आप हज़रात के सामने लाने की महज छोटी-सी कोशिश भर है, मुमकिन है कि तमाम ऐसे शोअरा हमारी नजर से छूट गए हों जो इस मज्मुअे में शामिल होते तो यह कोशिश और बेहतर होती मगर यह मानते हुये कि हर कोशिश में गुंजाइश हमेशा बनी रहती है, और इस पर अमल करते हुये इस काम को अंजाम दिया गया है। इस कोशिश को आप सब तक लाने में प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली के श्री हरीशचन्द्र शर्मा जी , डा0 लाल रत्नाकर (चित्रकार), जनाब अक़ील नोमानी, श्री तुफैल चतुर्वेदी, श्री मयंक अवस्थी, जनाब आदिल रज़ा मंसूरी, श्री मनीष शुक्ला, श्री उमापति (प्रवक्ता उर्दू), श्रीमती अंजू सिंह (शरीक ए हयात) का विशेष सहयोग रहा है । आप सब का आभारी हूँ ! एक बार फिर सभी शोअरा का और ख़ासकर आप सभी का तहेदिल से शुक्रिया!
यद्दपि  चाहत थी कि इस संकलन का विमोचन किसी कार्यक्रम में कराऊँ किन्तु समयाभाव के कारण ये मुमकिन न हो सका ! एक अनौपचारिक से कार्यक्रम में ' शीन क़ाफ़ निज़ाम ' साहब से इसका विमोचन करा लिया गया है।तमन्ना है कि जल्द ही दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित कर इस संकलन का औपचारिक विमोचन भी करा लूँ ।
                 फ़िलहाल ' दस्तक ' आपके प्यार की मुन्तज़िर है...................!

जून 20, 2013

मणीन्द्रनाथ बनर्जी की शहादत का स्मरण !!! (80वीं पुण्य तिथि)

            मणीन्द्रनाथ बनर्जी का नाम भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकीशहादत उत्तर-प्रदेश के फतेहगढ़ के सेण्ट्रल जेल में हुई थी। लगातार दो माह के आमरण अनशन के पश्चात जेल में ही उन्होंने 20 जून 1934 को प्राण त्यागे। आज उनकी शहादत की 80वीं पुण्य तिथि है।
                        मणीन्द्रनाथ बनर्जी का पूरा परिवार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुडा हुआ था। उनका जन्म 13 जनवरी 1907 में बनारस में हुआ था। मणीन्द्रनाथ के पूर्वज बंगाल से आकर बनारस में बस गये थे। इनके पिता श्री ताराचन्द्र बनर्जी वनारस के सुप्रसिद्व होम्योपैथिक चिकित्सक थे। इनकी माता सुनयना एक साहसी महिला थी तथा क्रान्तिकारी विचारधारा से सहमत थी। दादा हरीशंकर उर्फ हरीप्रसन्न डिप्टीकलेक्टर के पद पर रहे थे जो देश प्रेम के चलते अपने पद से त्याग पत्र देकर 1886 में भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय हो गये थे। परिवार के बुजुर्गों की देश प्रेम की भावना का प्रभाव आगे की पीढ़ी पर भी पड़ा। ताराचन्द्र बनर्जी की आठ संतानें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गयी। मणीन्द्रनाथ बनर्जी अपने अन्य भाइयों की तरह आन्दोलन में शामिल  हो गए। परिजनों से मिले संस्कार से देश प्रेम की भावना लिये आठों भाई जीवनधन, प्रभाशबाबू, मणीन्द्रनाथ, फणीन्द्रनाथ, अमिय, भूपेन्द्र, मोहित और बसंतबाबू स्वतंत्रता संग्राम में कूद पडे़। इनके घर पर क्रान्तिकारियों का आना जाना लगा रहता था। उन दिनों हिन्दुस्तान में क्रांतिकारी आंदोलन का उफान था। देश के विभिन्न भागों में क्रांतिकारी संगठन कार्यरत थे जो युवाओं को आंदोलन से जुड़ने के लिये प्रेरित करते थे। इसी दौरान 16-17 साल के युवक मणीन्द्रनाथ बनर्जी का झुकाव ‘‘अनुशीलन‘‘ क्रांतिकारी दल की तरफ हुआ। वे क्रान्तिकारी संगठन ‘‘अनुशीलन‘‘ में शामिल हो गये थे। 
                        1925 का  अगस्त माह क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना  जाता है। इस महीने की तारीख़ को पण्डित रामप्रसाद विस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने  काकोरी के पास रेलगाड़ी का खजाना लूटा । जिसमें चालीस लोग गिरफ्तार हुये थे।जिसमे रामप्रसाद विस्मिल,अशफाक उल्लाह खां ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी की सजा तथा शेष लोगों को अन्य प्रकार की सजायें दी गयी थीं।
                        महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि काकोरी केस की जाँच सीआईडी इन्सपेक्टर जितेन्द्रनाथ बनर्जी ने की तथा बड़ी ही होशियारी से क्रान्तिकारियों को फंसाया। वे मणीन्द्रनाथ के मामा थे। बाद में ब्रिटिश सरकार से क्रान्तिकारियों को सजा दिलाने के लिये इन्हें ब्रिटिश सरकार ने ईनाम के तौर पर रायबहादुर की उपाधि प्रदान की। 17 दिसम्बर 1927 को गोंडा जेल में अपने मित्र राजेन्द्र लाहिड़ी के फांसी पर चढ़ने के बाद मणीन्द्र नाथ ने इसके जिम्मेदार अपने मामा को मारने का निश्चय कर लिया।  19 जनवरी सन् 1928 को गोदौलिया स्थित मारवाड़ी अस्पताल के सामने जाते हुये अपने मामा जितेन्द्र नाथ बनर्जी को मणीन्द्रनाथ ने यह कहते हुये गोली मार दी कि ‘‘जितेन्द्र दा, फांसी दिलाने का ईनाम लो‘',  गोलियाँ लगते ही मणीन्द्रनाथ वहां से भाग निकले लेकिन न जाने उनके मन में क्या आया कि वह  वापस जितेन्द्र नाथ के पास आये और बोले "रायबहादुर तुम्हें काकोरी का इनाम मिल गया"। जमीन पर पड़े जितेन्द्र नाथ के शोर मचाने पर मणीन्द्रनाथ गिरफ्तार कर लिये गये। इसी बीच उन्होंने अपनी पिस्तौल फेंक दी जिसे उनका एक साथी उठाकर भाग गया। यद्यपि तीन दिन बेहोश रहने के बाद भी जितेन्द्र नाथ बनर्जी बच गये लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में भी मणीन्द्रनाथ को 10 वर्ष के कारावास तथा तीन वर्ष की तन्हाई की सजा सुनाई गई और फतेहगढ़ सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया। सजा के विरूद्व अपील के लिये मणीन्द्रनाथ ने अपील की परन्तु अपील खारिज हो गयी तथा सजा बरकरार रही बाद में काकोरी काण्ड में सजा पाये मन्मथनाथ गुप्त 1924 में तथा रमेशचन्द्र गुप्त व यशपाल भी फतेहगढ़ सेण्ट्रल जेल में पहुँच गये। 
सेण्ट्रल जेल में एक दिन जेलर ने राजनैतिक बन्दी चन्द्रमा सिंह को पीटा। इसके विरोध में चन्द्रमा सिंह ने अनशन शुरू कर दिया। 14 मई, 1934 से सभी राजनैतिक बन्दी भूख हड़ताल पर उतर आये किन्तु बाद में सरकारी धमकी के चलते चन्द्रमा ने भूख हड़ताल तोड़ दी लेकिन  मणीन्द्रनाथ फिर भी भूख हड़ताल पर बने  रहे। भूख हड़ताल से गिरते स्वास्थ्य तथा असहाय स्थितियों में मन्मथनाथ एवं यशपाल ने काफी देखभाल की परन्तु दिनांक 20 जून 1934 को सायंकाल सवा चार बचे मणीन्द्रनाथ बनर्जी हमेशा के लिये अपने मित्र मन्मथनाथ की गोद में सो गये। जेल अधिकारियों ने मणीन्द्रनाथ के शव  को घटियाघाट स्थित शमशान घाट पर उनकी माँ की उपस्थित में दाह संस्कार कर दिया। उनके साथी कैदी मणीन्द्रनाथ को सुदामाजी कहा करते थे।

उनकी स्मृति में केन्द्रीय कारागार फतेहगढ़ के मुख्य द्वार पर स्थित बनर्जी की प्रतिमा स्थापित की गयी है! इस प्रतिमा के समक्ष शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेलेकी तर्ज पर प्रतिवर्ष  उन्हें भावभीनी श्रृद्वांजलि देते हुये उनके वीरतापूर्ण कार्य को और उनकी शहादत को याद किया जाता है।